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बुधवार, 1 अप्रैल 2020
लहसुन के अनेक गुणों को जाने |
लहसुन प्याज की जाति की वनस्पति है| इस वनस्पति में एक तीव्र गंध होती है जिसके कारन इसे एक औषधि का दर्जा दिया गया है| दुनियाभर में लहसुन का उपयोग मसाले, चटनी, सॉस, अचार तथा दवाओ के तौर पर किया जाता है|
लहसुन की कुछ औषधिक विशेषताएं
⦁ सल्फर पदार्थ के होने के कारण लहसुन में एक तीव्र गंध आती है जिसके कारण इसमें रोगानुरोधक विशेषताएं भी होती है|
⦁ लहसुन के तेल में गंध ज्यादा मात्रा में पाया जाता है इस, लिए इसमें औषधी तत्व होते है|
⦁ लहसुन पुष्टि कर, वीर्यवर्धक, गर्म, पाचक, रेचक है|
⦁ लहसुन मेधा शक्ति वर्धक है|
लहसुन की ६ विशेषताएं
⦁ सांस के विकार, दमा |
⦁ पाचन विकार |
⦁ उच्च रक्त चाप |
⦁ हृदय रोग |
⦁ कैंसर | Cancer
⦁ त्वचा विकार |
1. सांस के विकार, दमा
लहसुन दमा के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक साबित हो सकता है| सांस आसानी से चले, इसलिये लहसुन की एक पंखुडी गर्म करके नमक के साथ खाये| दमा कम होने लिये एक प्याली गर्म पानी में दो चम्मच शहद और १० बूंद लहसुन का रस लीजिये| सोने से पूर्व लह्सून की ३ पंखुडीया दुध में उबालकर लेने से रात में दमा की तकलीफ काफी हद तक कम हो सकती है| दमा से आराम पाने के लिये एक लहसुन बारीक पीस कर १२० मिली माल्ट व्हिनेगरमें डाल कर उबाल लीजिये| थंडा होने के बाद छानकर, उतनी ही मात्रा में शहद मिलाकर तय्यार करे| यह रसायन २ चम्मच मेथी के अर्क के साथ सोने से पूर्व लें| न्युमोनिया में आराम पाने के लिये एक लिटर पानी में एक ग्राम लहसुन और २५० मिली दूध डालकर उबाले| एक चौथाई होने तक उबालते रहे| यह दूध दिन में तीन बार लें| क्षय रोग में आराम पाने के लिये लहसुन दूध में उबाल कर लेना चाहिये, ऐसा आयुर्वेद में बताया गया है
2. पाचन विकार
लहसुन शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है| पाचन रस का स्त्राव अच्छा करता है जिससे आंतो की सर्पिल हलचल में गती मिलती है|किसी भी पाचन विकार में लह्सून का दुध या पानी के साथ अर्क लिया जा सकता है| आन्तों के जीवाणू संक्रमण में लहसुन के इस्तेमाल से फायदा मिलता है| यह कृमी नाशक भी है और हर रोज लहसुन के दो गांठे खाने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है|कोलायटीस, पेचीश में लहसुन की एक कॅप्सूल काफी है| पेट की सभी रोगों से रहत पाने के लिए लहसुन एक हिस्सा, सैन्धा नमक और घी में भुना हुआ हिंग एक चौथाई हिस्सा, अद्रक के रस के साथ लेने से बहुत लाभ मिलता है|
रविवार, 20 जनवरी 2019
माइग्रेन से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय
माइग्रेन से बचने के उपाय
1.संतुलित व पौष्टिक आहार का प्रयोग करें।
2.भोजन का समय तय कर समयनुसार भोजन करें।
3.किसी भी बात का तनाव न ले और सकारात्मक विचार बनाए रखें।
4.अपनी पूरी नींद ले।
5.थकान महसूस होने पर विश्राम करें।
6.हल्के हाथ से सर में मालिश करें।
7.खुद को व्यस्त रखें और ऐसे काम जिससे आपका मन संतुष्ट हो।
8.किसी भी तरह के विवाद और तनाव से बचें। किसी से घमंड न करें।
बीमारी होने पर आहार का रखें ध्यान
माइग्रेन की शिकायत होने पर रोगी को अपने खाने पीने का विशेष ख्याल रखना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार माइग्रेन के रोगी को अपने खाने में निम्नलिखित चीजों का प्रयोग करना चाहिए-
1.संतुलित व पौष्टिक आहार ही खाएं।
2.देशी घी (विशेष तौर पर गाय के घी) से बना पदार्थ जैसे मालपुआ, जलेबी, हलुआ आदि का आधिक प्रयोग करें।
3.देशी घी में चीनी मिलाकर खाने से माइग्रेन में आराम मिलता है।
4.माइग्रेन होने पर ताजे फल व हरी सब्जियों का बहुत ज्यादा प्रयोग करें।
5.पौष्टिक तत्वों के लिए दूध, दलिया व पनीर का बहुत अधिक प्रयोग करें।
गुरुवार, 13 दिसंबर 2018
मुँह के छाले
मुख व्रण या मुँह के छाले एक आम समस्या है जो विभिन्न कारणों से उत्पन्न हो सकते हैं. ये देखने में छोटे घावदार लाल या सफेद मुख वाले जो किनारों पर सूजन लिए होते हैं. वैसे तो सरलता से ही ठीक हो जाते हैं परंतु कभी-कभी मुश्किल से ठीक होने वाले बड़े चालों में आयुर्वेदीय औषधियों का प्रयोग किया जाता है. ये विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं:
⦁ छोटे (2-8 मिली मीटर वर्गाकार के)
⦁ बड़े: बड़े छाले जो ज़्यादा गहरे तक मुख में घाव बना देते हैं तथा ये ठीक होने पर एक निशान छोड़ देते हैं.
⦁ दर्द वाले या बिना दर्द करनेवाले.
⦁ हरपीस के कारण उत्पन्न छाले.
मुँह के छाले होने के कारण
⦁ मुख व्रण क़ब्ज़ के कारण भी हो सकते है. इस अवस्था में क़ब्ज़ को हटाने से छाले भी सर्वथा ठीक हो जाते हैं.
⦁ अपच: किसी भी प्रकार की अपच अथवा अजीर्ण से मुख में छालों की समस्या उत्पन्न होती है.
⦁ विटामिन ब-कॉंप्लेक्स और विटामिन सी की कमी से.
⦁ कॅल्षियम की कमी के कारण.
⦁ अत्यधिक मसालेदार भोजन के सेवन से
⦁ कम पानी पीने के कारण.
वास्तव में ये शरीर में पित्त के बढ़ जाने से उत्पन्न होते हैं.
मुख के छालों के लिए आसान प्रयोग
⦁ धनिया के कुछ पत्तों का पेस्ट बनाकर पानी में घोल लें और इनसे दिन में 3-4 बार गरारे करें.
⦁ दिन में 2-3 बार कच्चे टमाटर खाएँ या इनका जूस पीजिए.
⦁ इन पर घी या अनारियल तेल लगाने से ये जल्दी ही ठीक हो जाते हैं.
⦁ गरम और ठंडे पानी से बारी- बारी से गरारे करने से भी मुख के छालों में बहुत लाभ मिलता है.
⦁ हल्दी और ग्लिसरीन को मिक्स कर लें और इस पेस्ट को छालों पर लगावें. यह बहुत असरदार प्रयोग है.
⦁ थोड़ी सी कर्पूर में मीठी कॅंडी पीस लें. ये मिश्रण छालों के उपर लगाएँ.
⦁ नारियल पानी से गरारे करते हुए इसे दिन में 2-3 बार पीजिए. इससे आश्चर्यजनक
⦁ सुबह उठकर केला और दही खाएँ. दिन में गर्म, मसालेदार खाने मत लीजिए.
⦁ नारियल तेल और शहद के प्रयोग से भी इस दिक्कत में लाभ मिलता है.
⦁ चाय और कॉफी का सर्वथा त्याग करें.
⦁ बेर को पीसकर इसे छाले पर लगाएँ.
⦁ दूध अथवा पानी में 1-1 चम्मच जीरा और धनिया के दाने डालकर तब तक उबालें जब तक की मिश्रण आधा ना रह जाए. इसमें स्वादानुसार शर्करा अथवा गुड मिला लें. इस घोल का सेवन दिन में दो बार करें. इससे अपच से भी निवरत्ति मिलती है.
⦁ मधु को उंगली पर लगाकर उसे छालों पर लगाने से इनके प्रकोप से राहत मिलती है.
⦁ आम या अमरूद के नर्म पट्टियों को चबाकर उनका रस मुख में चालों के स्थान पर रखने से तथा इनके सेवन से भी इस ताकलीफ़ से राहत मिलती है. यही प्रयोग अगर जाजी मालीगी के पत्तों द्वारा किया जाए तो अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है. इनसे थोड़ी देर के लिए सुन्न्ता का अनुभव होता है परंतु शीघ्र ही आराम आ जाता है.
⦁ जीरा का आधा चम्मच चबाकर खाने के उपरांत १ गिलास पानी पीजिए. इस प्रयोग से भी चालों में अत्यंत लाभ मिलता है.
कुछ आयुर्वेदीय औषधियाँ बड़े और मुश्किल से ठीक होने वाले मुख के छालों में उपयोग की जा सकती हैं.
⦁ त्रिफला चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है.
⦁ खादिराधी वॅटी के प्रयोग से भी ये छाले कम हो जाते हैं और मुख की दुर्गंध भी नष्ट हो जाती है.
शुक्रवार, 30 नवंबर 2018
मोटापा घटाने के उपाय
- मूली के रस में थोडा नमक और निम्बू का रस मिलाकर नियमित रूप से पीने से मोटापा कम हो जाता है और शरीर सुडौल हो जाता है !
- .गेहूं ,चावल,बाजरा और साबुत मूंग को समान मात्रा में लेकर सेककर इसका दलिया बना लें ! इस दलिये में अजवायन २० ग्राम तथा सफ़ेद तिल ५० ग्राम भी मिला दें ! ५० ग्राम दलिये को ४०० मि.ली.पानी में पकाएं ! स्वादानुसार सब्जियां और हल्का नमक मिला लें ! नियमित रूप से एक महीनें तक इस दलिये के सेवन से मोटापा और मधुमेह में आश्चर्यजनक लाभ होता है !
- .अश्वगंधा के एक पत्ते को हाथ से मसलकर गोली बनाकर प्रतिदिन सुबह,दोपहर,शाम को भोजन से एक घंटा पहले या खाली पेट जल के साथ निगल लें ! एक सप्ताह के नियमित सेवन के साथ फल,सब्जियों,दूध,छाछ और जूस पर रहते हुए कई किलो वजन कम किया जा सकता है !
- आहार में गेहूं के आटे और मैदा से बने सभी व्यंजनों का सेवन एक माह तक बिलकुल बंद रखें ! इसमें रोटी भी शामिल है ! अपना पेट पहले के ४-६ दिन तक केवल दाल,सब्जियां और मौसमी फल खाकर ही भरें ! दालों में आप सिर्फ छिलके वाली मूंग कि दाल ,अरहर या मसूर कि दाल ही ले सकतें हैं चनें या उडद कि दाल नहीं ! सब्जियों में जो इच्छा करें वही ले सकते हैं ! गाजर,मूली,ककड़ी,पालक,पतागोभी,पके टमाटर और हरी मिर्च लेकर सलाद बना लें ! सलाद पर मनचाही मात्रा में कालीमिर्च,सैंधा नमक,जीरा बुरककर और निम्बू निचोड़ कर खाएं !
- बस गेहूं कि बनी रोटी छोडकर दाल,सब्जी,सलाद और एक गिलास छाछ का भोजन करते हुए घूंट घूंट करके पीते हुए पेट भरना चाहिए ! इसमें मात्रा ज्यादा भी हो जाए तो चिंता कि कोई बात नहीं ! इस प्रकार ६-७ दिन तक खाते रहें ! इसके बाद गेहूं कि बनी रोटी कि जगह चना और जौ के बने आटे कि रोटी खाना शुरू करें ! ५ किलो देशी चना और एक किलो जौ को मिलकर साफ़ करके पिसवा लें ! ६-७ दिन तक इस आटे से बनी रोटी आधी मात्रा में और आधी मात्रा में दाल,सब्जी,सलाद और छाछ लेना शुरू करें ! एक महीने बाद गेहूं कि रोटी खाना शुरू कर सकते हैं लेकिन शुरुआत एक रोटी से करते हुए धीरे धीरे बढाते जाएँ ! भादों के महीने में छाछ का प्रयोग नहीं किया जाता है इसलिए इस महीनें में छाछ का प्रयोग नां करें !!
- एरण्ड की जड़ का काढ़ा बनाकर उसको छानकर एक एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार नियमित सेवन करने से मोटापा दूर होता है !!
- . चित्रक कि जड़ का चूर्ण एक ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह शाम नियमित रूप से सेवन करने और खानपान का परहेज करनें से भी मोटापा दूर किया जा सकता है !!
रविवार, 25 नवंबर 2018
खाली पेट चाय पीने के साइड इफेक्ट्स
सुबह खाली पेट रहने पर बॉडी में एसिड की मात्रा बढ़ती है। चाय में भी एसिड होता है। ऐसे में अगर खालीपेट चाय पिएंगे तो एसिड की मात्रा ज्यादा बढ़ेगी जिससे एसिडिटी और अन्य हेल्थ प्रॉब्लम हो सकते हैं। इसलिए सुबह चाय पीने से पहले कुछ जरूर खाना चाहिए। हम बता रहे हैं खालीपेट चाय से होने वाले ऐसे ही नुकसान के बारे में।
सुबह खाली पेट चाय पीने के साइड इफेक्ट्स
1. खाली पेट ब्लैक टी पीने से पेट फूलता है।
2. चाय एसिडिक होती है। खाली पेट पीने से एसिडिटी बढाती है।
3. चाय खाली पेट में गैस्ट्रिक म्यूकोसा बढ़ा देती है जिससे भूख कम होती है।
4. चाय में टेनिन होता है। इससे खाली पेट चाय पीने से उल्टी जैसा फील होता है।
5. एक दिन में 4-5 कम चाय पीने से पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की संभावना हो सकती है।
6. खाली पेट पीने से चाय बॉडी में प्रोटीन और दूसरे न्यूट्रिएंट्स का अब्जॉर्बेशन कम करती है।
7. खाली पेट दूध वाली चाय पीने से थकान महसूस होती है और चिड़चिड़ापन बढ़ता है।
8. ज्यादा स्ट्रांग चाय पीने वालों को अल्सर होने का खतरा रहता है।
9. अदरक की चाय खाली पेट पीने से गैस की प्रॉब्लम हो सकती है।
10. चाय में कैफीन, एल-थायनिन और थियोफाइलिन होता है। इससे खाली पेट पीने से अपच हो सकती है।
चाय पीने का सही तरीका-
डॉक्टर्स के अनुसार चाय के साथ हमेशा बिस्कुट या अन्य कोई स्नैक्स लेने चाहिए। चाय के साथ बिस्कुट या अन्य चीज़ें खाने से पेट दृारा चाय अच्छी तरह से पचा ली जाती है। दूसरी ओर चाय के साथ नमकीन या मीठा खाने से शरीर को सोडियम की प्राप्ती होती है, जिससे अल्सर नहीं होता।
शनिवार, 24 नवंबर 2018
यूरिक एसिड नियत्रंण करने के आर्युवेदिक तरीके
यूरिक एसिड का मतलब है, जो भोजन खाया जाता है, उसमें प्यूरीन पोष्टिकता संतुलन की कमी से रक्त में असंतुलन प्रक्रिया है। जिससे प्यूरीन टूटने से यूरिक एसिड बनता है। यूरिक ऐसिड एक तरह से हड्डियों जोड़ों अंगों के बीच जमने वाली एसिड़ क्रिस्टल है। जोकि चलने फिरने में चुभन जकड़न से दर्द होता है। जिसे यूरिक एसिड कहते हैं। शोध में यूरिक एसिड को शरीर में जमने वाले कार्बन हाइड्रोजन आक्सीजन नाइट्रोजन सी-5, एच-4, एन-4, ओ-3 का समायोजक माना जाता है। यूरिक एसिड बढ़ने की समस्या बडी तेजी से बढ़ रही है। आयु बढ़ने के साथ-साथ यूरिन एसिड गाउट आर्थराइटिस समस्या का होना तेजी से आंका गया है। जोकि लाईफ स्टाईल, खान-पान, दिनचर्या के बदलाव से भोजन पाचन प्रक्रिया के दौरान बनने वाले ग्लूकोज प्रोटीन से सीधे यूरिन एसिड में बदलने की प्रक्रिया को यूरिन एसिड कहते हैं। भोजन पाचन प्रक्रिया दौरान प्रोटीन से ऐमिनो एसिड और प्यूरीन न्यूक्लिओटाइडो से यूरिक एसिड बनता है। यूरिक एसिड समय पर नियत्रंण करना अति जरूरी है। यूरिक एसिड बढ़ने पर समय पर उपचार ना करने से जोड़ों गाठों का दर्द, गठिया रोग, किड़नी स्टोन, डायबिटीज, रक्त विकार होने की संभावनाएं ज्यादा बढ़ जाती है। रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा को नियत्रंण करना अति जरूरी है।
यूरिक एसिड के लक्षण :
पैरो-जोड़ों में दर्द होना।
पैर एडियों में दर्द रहना।
गांठों में सूजन
जोड़ों में सुबह शाम तेज दर्द कम-ज्यादा होना।
एक स्थान पर देर तक बैठने पर उठने में पैरों एड़ियों में सहनीय दर्द। फिर दर्द सामन्य हो जाना।
पैरों, जोड़ो, उगलियों, गांठों में सूजन होना।
शर्करा लेबल बढ़ना। इस तरह की कोई भी समस्या होने पर तुरन्त यूरिक एसिड जांच करवायें।
यूरिक एसिड नियत्रंण करने के आर्युवेदिक तरीके :
1. यूरिक एसिड बढ़ने पर हाईड्रालिक फाइबर युक्त आहार खायें। जिसमें पालक, ब्रोकली, ओट्स, दलिया, इसबगोल भूसी फायदेमंद हैं।
2. आंवला रस और एलोवेरा रस मिश्रण कर सुबह शाम खाने से 10 मिनट पहले पीने से यूरिक एसिड कम करने में सक्षम है।
3. टमाटर और अंगूर का जूस पीने से यूरिक एसिड तेजी से कम करने में सक्षम है।
4. तीनो वक्त खाना खाने के 5 मिनट बाद 1 चम्मच अलसी के बीज का बारीक चबाकर खाने से भोजन पाचन क्रिया में यूरिक ऐसिड नहीं बनता।
5. 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच अश्वगन्धा पाउडर को 1 कप गर्म दूध के साथ घोल कर पीने से यूरिक एसिड नियत्रंण में आता है।
6. यूरिक एसिड बढ़ने के दौरान जैतून तेल का इस्तेमाल खाने तड़के-खाना बनाने में करें। जैतून तेल में विटामिन-ई एवं मिनरलस मौजूद हैं। जोकि यूरिक एसिड नियत्रंण करने में सहायक हैं।
7. यूरिक एसिड बढ़ने पर खाने से 15 पहले अखरोट खाने से पाचन क्रिया शर्करा को ऐमिनो एसिड नियत्रंण करती है। जोकि प्रोटीन को यूरिक एसिड़ में बदलने से रोकने में सहायक है।
8. विटामिन सी युक्त चीजें खाने में सेवन करें। विटामिन सी यूरिक एसिड को मूत्र के रास्ते विसर्ज करने में सहायक है।
9. रोज 2-3 चैरी खाने से यूरिक एसिड नियत्रंण में रखने में सक्षम है। चेरी गांठों में एसिड क्रिस्टल नहीं जमने देती।
10. सलाद में आधा नींबू निचैड कर खायें। दिन में 1 बार 1 गिलास पानी में 1 नींबू निचैंड कर पीने से यूरिक एसिड मूत्र के माध्यम से निकलने में सक्षम है। चीनी, मीठा न मिलायें।
11. तेजी से यूरिक एसिड घटाने के लिए रोज सुबह शाम 45-45 मिनट तेज पैदल चलकर पसीना बहायें। तेज पैदल चलने से एसिड क्रिस्टल जोड़ों गांठों पर जमने से रोकता है। साथ में रक्त संचार को तीब्र कर रक्त संचार सुचारू करने में सक्षम है। पैदल चलना से शरीर में होने वाले सैकड़ों से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है। तेज पैदल चलना एसिड एसिड को शीध्र नियत्रंण करने में सक्षम पाया गया है।
12. बाहर का खाना पूर्ण रूप से बन्द कर दें। घर पर बना सात्विक ताजा भोजन खायें। खाने में ताजे फल, हरी सब्जियां, सलाद, फाइबर युक्त संतुलित पौष्टिक आहर लें।
13. रोज योगा आसान व्यायाम करें। योग आसान व्यायाय यूरिक एसिड को घटाने में मद्दगार है। साथ में योगा-आसान-व्यायाम करने से मोटापा वजन नियत्रंण रहेगा।
14. ज्यादा सूजन दर्द में आराम के लिए गर्म पानी में सूती कपड़ा भिगो कर सेकन करें।
15. यूरिक एसिड समस्या शुरू होने पर तुरन्त जांच उपचार करवायें। यूरिक एसिड ज्यादा दिनों तक रहने से अन्य रोग आसानी से घर बना लेते हैं।
16.यूरिक एसिड बढ़ने पर मीट मछली सेवन तुरन्त बंद कर दें। नॉनवेज खाने से यूरिक एसिड तेजी से बढ़ता है। औषधि दवाईयां असर कम करती है।
17.यूरिक एसिड बढ़ने पर अण्डा का सेवन पूर्ण रूप से बंद कर दें। अण्डा रिच प्रोटीन वसा से भरपूर है। जोकि यूरिक एसिड को बढ़ता है।
18.बेकरी से बनी सही खाद्य सामग्री बंद कर दें। बेकरी फूड प्रीजरवेटिव गिला होता है। जैसेकि पेस्ट्री, केक, पैनकेक, बंन्न, क्रीम बिस्कुट इत्यादि।
19.यूरिक एसिड बढ़ने पर तुरन्त जंकफूड, फास्ट फूड, ठंडा सोडा पेय, तली-भुनी चीजें बन्द कर दें। जंकफूड, फास्टफूड, सोडा ठंडा पेय पाचन क्रिया को और भी बिगाड़ती है। जिससे एसिड एसिड तेजी से बढता है।
चावल, आलू, तीखे मिर्चीले, चटपटा, तले पकवानों का पूरी तरह से खाना बन्द कर दें। यह चीजें यूरिक एसिड बढ़ाने में सहायक हैं।
20.बन्द डिब्बा में मौजूद हर तरह की सामग्री खाना पूरी तरह से बंद कर दें। बन्द डब्बे की खाने पीने की चीजों में भण्डारण के वक्त कैम्किल रसायन मिलाया जाता है। जैसे कि तरह तरह के प्लास्टिक पैक चिप्स, फूड इत्यादि। हजारों तरह के बन्द डिब्बों और पैकेट की खाद्य सामग्री यूरिक एसिड तेजी बढ़ाने में सहायक है।
21.एल्कोहन का सेवन पूर्ण रूप से बन्द कर दें। बीयर, शराब यूरिक एसिड तेजी से बढ़ती है। शोध में पाया गया है कि जो लोग लगातार बीयर शराब नशीली चीजों का सेवन करते हैं, 70 प्रतिशत उनको सबसे ज्यादा यूरिक एसिड की समस्या होती है। यूरिक एसिड बढ़ने पर तुरन्त बीयर, शराब पीना बन्द कर दें। बीयर शराब स्वस्थ्य व्यक्ति को भी रोगी बना देती है। बीयर, शराब नशीली चीजें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
शुक्रवार, 23 नवंबर 2018
दूर हो जायेंगे सब रोग सिर्फ इसका प्रयोग करने से
तुलसी
हिंदू धर्म में तुलसी को सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि देवी का रूप माना गया है। यही कारण है कि आंगन में तुलसी का पौधा लगाना और उसकी पूजा करना सदियों से भारतीय परंपरा रही है। घर में तुलसी लगाने और उसकी पूजा करने के पीछे भी कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं। ऋषि-मुनियों ने यह अनुभव किया कि इस पौधे में कई बीमारियों को ठीक करने की क्षमता है। साथ ही, इसे लगाने से आसपास का माहौल भी साफ-सुथरा व स्वास्थ्यप्रद रहता है। इसीलिए उन्होंने हर घर में कम से कम एक पौधा लगाने के लिए लोगों को प्रेरित किया।
भारतीय आयुर्वेद के सबसे प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता में कहा गया है।
तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली दिल के लिए लाभकारी, त्वचा रोगों में फायदेमंद, पाचन शक्ति बढ़ाने वाली और मूत्र से संबंधित बीमारियों को मिटाने वाली है। यह कफ और वात से संबंधित बीमारियों को भी ठीक करती है।
शास्त्रों में भी कहा गया है
यदि सुबह, दोपहर और शाम को तुलसी का सेवन किया जाए तो उससे शरीर इतना शुद्ध हो जाता है, जितना अनेक चांद्रायण व्रत के बाद भी नहीं होता। तुलसी की गंध जितनी दूर तक जाती है, वहां तक का वातारण और निवास करने वाले जीव निरोगी और पवित्र हो जाते हैं।
तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली कफ, खांसी, हिचकी, उल्टी, कृमि, दुर्गंध, हर तरह के दर्द, कोढ़ और आंखों की बीमारी में लाभकारी है। तुलसी को भगवान के प्रसाद में रखकर ग्रहण करने की भी परंपरा है, ताकि यह अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही शरीर के अंदर पहुंचे और शरीर में किसी तरह की आंतरिक समस्या पैदा हो रही हो तो उसे खत्म कर दे। शरीर में किसी भी तरह के दूषित तत्व के एकत्र हो जाने पर तुलसी सबसे बेहतरीन दवा के रूप में काम करती है। सबसे बड़ा फायदा ये कि इसे खाने से कोई रिएक्शन नहीं होता है।
तुलसी की मुख्य जातियां- तुलसी मुख्यत: पांच प्रकार की होती है लेकिन घरों में दो प्रकार की तुलसी लगाई जाती हैं, ये हैं इन्हें रामा और श्यामा।
रामा तुलसी को गौरी भी कहा जाता है क्योंकि इनके पत्तों का रंग हल्का होता है।
श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग काला होता है। इसमें कफनाशक गुण होते हैं और इसलिए इसे दवा के रूप में अधिक उपयोग में लाया जाता है।
वन तुलसी में जहरनाशक प्रभाव पाया जाता है, लेकिन इसे घरों में बहुत कम लगाया जाता है। आंखों के रोग, कोढ़ और प्रसव में परेशानी जैसी समस्याओं में यह कारगर दवा है।
एक अन्य जाति मरूवक है, जो बहुत कम पाई जाती है। राजमार्तण्ड ग्रंथ के अनुसार किसी भी तरह का घाव हो जाने पर इसका रस बेहतरीन दवा की तरह काम करता है।
तुलसी की एक और जाति जो बहुत उपयोगी है वह है, बर्बरी तुलसी। इसके बीजों का प्रयोग वीर्य को गाढ़ा करने वाली दवा के रूप में किया जाता है।
तुलसी के फायदे
* जुकाम के कारण आने वाले बुखार में भी तुलसी के पत्तों के रस का सेवन करना चाहिए।
* तुलसी के रस में पाए जाने थाइमोल तत्व से त्वचा के रोगों में लाभ होता है।
* तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ने से त्वचा के संक्रमण में फायदा मिलता है।
* ज्यादा थकान होने पर तुलसी की पत्तियों और मंजरी का सेवन करें, थकान दूर होगी।
* फ्लू के रोगियों को तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से काफी फायदा होता है।
* दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए यह अमृत समान है। इससे खून में कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है।
* रोजाना 4- 5 बार तुलसी की पत्तियाँ चबाने से कुछ ही दिनों में माइग्रेन की समस्या में आराम मिलता है।
* मलेरिया में तुलसी एक कारगर औषधि है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीने से मलेरिया जल्दी ठीक हो जाता है।
* तुलसी के पत्तों को तांबे के पानी से भरे बर्तन में एक घंटे तक भीगा रहने दें। यह पानी पीने से बहुत से बीमारियां पास नहीं आतीं।
* किडनी की पथरी होने पर रोगी को तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह तक पिलाएं, पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाएगी।
* शरीर टूट रहा हो या जब लग रहा हो कि बुखार आने वाला है तो पुदीने का रस और तुलसी का रस बराबर मात्रा में मिलाकर थोड़ा गुड़ डालकर सेवन करें, आराम मिलेगा।
* तुलसी के रस में मुलहटी व थोड़ा-सा शहद मिलाकर लेने से खांसी की परेशानी दूर हो जाती है, आप चाहें तो चार-पांच लौंग भूनकर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर भी पी सकते हैं।
* तुलसी के पत्तों और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से खांसी दूर होती है। इसके अलावा तुलसी व अदरक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी खांसी में बहुत जल्दी आराम मिलता है।
गुरुवार, 22 नवंबर 2018
पित्त की थैली की पथरी को दूर करने के घरेलू उपचार
कारण
अस्सी फीसदी पित्त की थैली की पथरी कोलेस्ट्रॉल के जमने या सख्त होने के कारण होती है। पित्त की पथरी के कारण पेट में असहनीय दर्द होता है, कई बार उल्टी भी हो सकती है। रोगी का खाना पचने में दिक्कत होने लगती है जिससे पेट में अपच और भारीपन रहता है। पित्त की थैली में पथरी होने के बारे में यही कहा जाता है कि बिना ऑपरेशन के इसे निकालना मुश्किल है।
लेकिन ऑपरेशन से पहले कुछ घरेलू उपाय अपनाकर देखें, संभव है कि पथरी गल जाए। कुछ घरेलू
उपाय न केवल पथरी को गला देंगे बल्कि पाचन को दुरूस्त करके दर्द को भी ठीक कर देंगे। आइए जानते हैं,
गुर्दे की पथरी के लिए पत्थरचट्टा के फायदे जानकारी के लिए क्लिक करे I
घरेलू उपाय
1. सेब का जूस और सेब का सिरका - सेब में पित्त की पथरी को गलाने का गुण होता है, लेकिन इसे जूस के रूप में सेब के सिरके के साथ लेने पर यह ज्यादा असरकारी होता है। सेब में मौजूद मैलिक एसिड पथरी को गलाने में मदद करता है तथा सेब का सिरका लिवर में कोलेस्ट्रॉल नहीं बनने देता, जो पथरी बनने के लिए जिम्मेदार होता है। यह घोल न केवल पथरी को गलाता है बल्कि दोबारा बनने से भी रोकता है और दर्द से भी राहत देता है।
उपचार के लिए- एक गिलास सेब के जूस में, एक चम्मच सेब का सिरका मिलाएं। इस जूस को रोजाना दिन भर में दो बार पीएं।
2. नाशपाती का जूस - नाशपाती के आकार की पित्त की थैली को नाशपाती द्वारा ही साफ किया जाना संभव है। नाशपाती में मौजूद पैक्टिन कोलेस्ट्रॉल को बनने और जमने से रोकता है। यूं भी नाशपाती गुणों की खान है जिसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं।
उपचार- एक गिलास गरम पानी में, एक गिलास नाशपाती का जूस और दो चम्मच शहद मिलाकर पीएं। इस जूस को एक दिन में तीन बार पीना चाहिए।
3. चुकंदर, खीरा और गाजर का जूस- जूस थेरेपी को पित्त की थैली के इलाज के लिए घरेलू उपचारों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। चुकंदर न केवल शरीर का मजबूती देता है बल्कि गॉल ब्लेडर को साफ भी करता है साथ ही लिवर के कोलोन को भी साफ करता है। खीरा में मौजूद ज्यादा पानी की मात्रा लिवर और गॉल ब्लेडर दोनों को डिटॉक्सीफाई करती है। गाजर में भी विटामिन सी और उच्च पोषक तत्व होने के कारण यही गुण होते हैं।
उपचार- एक चुकंदर, एक खीरा और चार गाजर को लेकर जूस तैयार करें। इस जूस को प्रतिदिन दो बार पीना है। जूस में प्रत्येक सामग्री की मात्रा बराबर होनी चाहिए, इसलिए सब्जी या फल के साइज के हिसाब से मात्रा
घटाई या बढ़ाई जा सकती है।
4. पुदीना - पुदीना को पाचन के लिए सबसे अच्छी घरेलू औषधि माना जाता है जो पित्त वाहिका तथा पाचन से संबंधित अन्य रसों को बढ़ाता है। पुदीना में तारपीन भी होता है जो कि पथरी को गलाने में सहायक माना जाता है। पुदीने की पत्तियों से बनी चाय गॉल ब्लेडर स्टोन से राहत दे सकती है।
उपचार- पानी को गरम करें, इसमें ताजी या सूखी पुदीने के पत्तियों को उबालें। हल्का गुनगुना रहने पर पानी
को छानकर इसमें शहद मिलाएं और पी लें। इस चाय को दिन में दो बार पीया जा सकता है।
5. खान-पान और दिनचर्या में बदलाव- रोजाना 8 से 10 गिलास पानी जरूर पीएं। चाहे प्यास न भी लगी हो।वसायुक्त या तेज मसाले वाले खाने से बचें।प्रतिदिन कॉफी जरूर पीएं। बहुत ज्यादा भी नहीं लेकिन दिन में एक से दो कप काफी हैं। कॉफी भी पित्त वाहिका को बढ़ाती है जिससे पित्त की थैली में पथरी नहीं होती। अपने खाने में विटामिन सी की मात्रा बढाएं। दिनभर में जितना ज्यादा संभव हो विटामिन सी से भरपूर चीजें खाएं। हल्दी, सौंठ, काली मिर्च और हींग को खाने में जरूर शामिल करें।
अस्सी फीसदी पित्त की थैली की पथरी कोलेस्ट्रॉल के जमने या सख्त होने के कारण होती है। पित्त की पथरी के कारण पेट में असहनीय दर्द होता है, कई बार उल्टी भी हो सकती है। रोगी का खाना पचने में दिक्कत होने लगती है जिससे पेट में अपच और भारीपन रहता है। पित्त की थैली में पथरी होने के बारे में यही कहा जाता है कि बिना ऑपरेशन के इसे निकालना मुश्किल है।
लेकिन ऑपरेशन से पहले कुछ घरेलू उपाय अपनाकर देखें, संभव है कि पथरी गल जाए। कुछ घरेलू
उपाय न केवल पथरी को गला देंगे बल्कि पाचन को दुरूस्त करके दर्द को भी ठीक कर देंगे। आइए जानते हैं,
गुर्दे की पथरी के लिए पत्थरचट्टा के फायदे जानकारी के लिए क्लिक करे I
घरेलू उपाय
1. सेब का जूस और सेब का सिरका - सेब में पित्त की पथरी को गलाने का गुण होता है, लेकिन इसे जूस के रूप में सेब के सिरके के साथ लेने पर यह ज्यादा असरकारी होता है। सेब में मौजूद मैलिक एसिड पथरी को गलाने में मदद करता है तथा सेब का सिरका लिवर में कोलेस्ट्रॉल नहीं बनने देता, जो पथरी बनने के लिए जिम्मेदार होता है। यह घोल न केवल पथरी को गलाता है बल्कि दोबारा बनने से भी रोकता है और दर्द से भी राहत देता है।
उपचार के लिए- एक गिलास सेब के जूस में, एक चम्मच सेब का सिरका मिलाएं। इस जूस को रोजाना दिन भर में दो बार पीएं।
2. नाशपाती का जूस - नाशपाती के आकार की पित्त की थैली को नाशपाती द्वारा ही साफ किया जाना संभव है। नाशपाती में मौजूद पैक्टिन कोलेस्ट्रॉल को बनने और जमने से रोकता है। यूं भी नाशपाती गुणों की खान है जिसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं।
उपचार- एक गिलास गरम पानी में, एक गिलास नाशपाती का जूस और दो चम्मच शहद मिलाकर पीएं। इस जूस को एक दिन में तीन बार पीना चाहिए।
3. चुकंदर, खीरा और गाजर का जूस- जूस थेरेपी को पित्त की थैली के इलाज के लिए घरेलू उपचारों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। चुकंदर न केवल शरीर का मजबूती देता है बल्कि गॉल ब्लेडर को साफ भी करता है साथ ही लिवर के कोलोन को भी साफ करता है। खीरा में मौजूद ज्यादा पानी की मात्रा लिवर और गॉल ब्लेडर दोनों को डिटॉक्सीफाई करती है। गाजर में भी विटामिन सी और उच्च पोषक तत्व होने के कारण यही गुण होते हैं।
उपचार- एक चुकंदर, एक खीरा और चार गाजर को लेकर जूस तैयार करें। इस जूस को प्रतिदिन दो बार पीना है। जूस में प्रत्येक सामग्री की मात्रा बराबर होनी चाहिए, इसलिए सब्जी या फल के साइज के हिसाब से मात्रा
घटाई या बढ़ाई जा सकती है।
4. पुदीना - पुदीना को पाचन के लिए सबसे अच्छी घरेलू औषधि माना जाता है जो पित्त वाहिका तथा पाचन से संबंधित अन्य रसों को बढ़ाता है। पुदीना में तारपीन भी होता है जो कि पथरी को गलाने में सहायक माना जाता है। पुदीने की पत्तियों से बनी चाय गॉल ब्लेडर स्टोन से राहत दे सकती है।
उपचार- पानी को गरम करें, इसमें ताजी या सूखी पुदीने के पत्तियों को उबालें। हल्का गुनगुना रहने पर पानी
को छानकर इसमें शहद मिलाएं और पी लें। इस चाय को दिन में दो बार पीया जा सकता है।
5. खान-पान और दिनचर्या में बदलाव- रोजाना 8 से 10 गिलास पानी जरूर पीएं। चाहे प्यास न भी लगी हो।वसायुक्त या तेज मसाले वाले खाने से बचें।प्रतिदिन कॉफी जरूर पीएं। बहुत ज्यादा भी नहीं लेकिन दिन में एक से दो कप काफी हैं। कॉफी भी पित्त वाहिका को बढ़ाती है जिससे पित्त की थैली में पथरी नहीं होती। अपने खाने में विटामिन सी की मात्रा बढाएं। दिनभर में जितना ज्यादा संभव हो विटामिन सी से भरपूर चीजें खाएं। हल्दी, सौंठ, काली मिर्च और हींग को खाने में जरूर शामिल करें।
सोमवार, 19 नवंबर 2018
सर दर्द से राहत के लिए
१. तेज़ पत्ती की काली चाय में निम्बू का रस निचोड़ कर पीने से सर दर्द में अत्यधिक लाभ होता है.
२ .नारियल पानी में या चावल धुले पानी में सौंठ पावडर का लेप बनाकर उसे सर पर लेप करने भी सर दर्द में आराम पहुंचेगा।
३. सफ़ेद चन्दन पावडर को चावल धुले पानी में घिसकर उसका लेप लगाने से भी फायेदा होगा.
४. सफ़ेद सूती का कपडा पानी में भिगोकर माथे पर रखने से भी आराम मिलता है.
५. लहसुन पानी में पीसकर उसका लेप भी सर दर्द में आरामदायक होता है.
६. लाल तुलसी के पत्तों को कुचल कर उसका रस दिन में माथे पर २ , ३ बार लगाने से भी दर्द में राहत देगा.
रविवार, 18 नवंबर 2018
हल्दी के नुकसान
हल्दी का प्रयोग हम अक्सर अपने खाने में मसाले के रूप में करते हैं। इससे हमारा खाना स्वादिष्ट बनता है। हल्दी में एंटी ऑक्सीडेट्स गुण पायें जाते हैं तथा यह हमें अनगिनत स्वास्थ्य लाभ देता है। हल्दी घाव, कटे और छिले पर मरहम के रूप में काम करती है। इसको फेस पैक में डालने से चेहरे का रंग चमकने लगता है। कुछ लोग इसका सेवन दूध में डालकर करते हैं लेकिन आज हम जानेंगे हल्दी के नुकसान के बारे में।
हल्दी के नुकसान
गालब्लैडर की समस्या
हल्दी का अधिक सेवन करने से गालब्लैडर में स्टोन बनने लगते हैं। इसके अलावा इससे गैस भी बनती है।
एलर्जी में सेवन न करें
यदि आपको मसाले का सेवन करने से एलर्जी की शिकायत है तो हल्दी का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। क्योंकि इससे आपकी एलर्जी और बढ़ सकती है।
लीवर की समस्या
यदि आपका लीवर बढ़ा हुआ है या फिर आपको लीवर संबंधी कोई अन्य समस्या है तो आपको हल्दी का सेवन तुरंत ही बंद कर देना चाहिए। क्योंकि इसमें मौजूद तत्व लीवर की समस्या को और बढ़ा देते हैं।
प्रेगनेंट महिलाएं
हल्दी के नुकसान की बात करें तो प्रेगनेंसी में कुछ महिलाएं दूध में हल्दी मिलाकर पीती हैं। जिससे उनका बच्चा गोरा पैदा हो लेकिन वो इस बात को नहीं जानती कि इसका सेवन करने से गर्भाशय का संकुचन या गर्भाशय में ऐंठन पैदा हो सकती है इसलिए हल्दी के इस नुकसान से भी जागरूक रहने की आवश्यकता है।
इनफर्टिलिटी की समस्या
हल्दी का अधिक सेवन करने से इनफर्टिलिटी की समस्या पैदा हो सकती है। यह समस्या खासतौर से पुरुषों में पाई जाती है।
खून की कमी
यदि आपको एनीमिया की शिकायत है तो आपको हल्दी का सेवन कम कर देना चाहिए।
सर्जरी के बाद
अगर आपकी अभी सर्जरी हुई है तो आपको हल्दी का सेवन कम कर देना चाहिए। क्योंकि हल्दी का अधिक सेवन करने से शरीर में ब्लड क्लाटिंग की समस्या पैदा हो सकती है। यही उनके लिए खतरनाक हो सकती है जिनकी अभी सर्जरी हुई है।
इम्युनिटी घटाएं
हल्दी का अधिक सेवन करने से इम्युनिटी सिस्टम प्रभावित होता है। जिससे वो अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर सकता।
उल्टी
खाने में हल्दी का अधिक प्रयोग करने से उल्टी आ सकती है।
सिर दर्द
जो लोग अक्सर सिर दर्द से परेशान रहते हैं। उनकी सिर दर्द का कारण हल्दी का अधिक मात्रा में सेवन भी हो सकती हैं।
किडनी स्टोन
हल्दी का अधिक मात्रा में सेवन करने से किडनी में स्टोन बनने लगते हैं। इसलिए हमें हल्दी का प्रयोग कम मात्रा में करना चाहिए।
शनिवार, 17 नवंबर 2018
सुबह खली पेट हल्दी वाला पानी पीने के फायदे
क्या आपने गर्म ढूध में हल्दी मिलकर पीने के फायदों के बारे में सुना है?
हल्दी वाला ढूध हमारे शरीर में एक एंटीबायोटिक की तरह काम करता है |और या फिर कोई भी चोट लग जाये या फिर कोई शारीरिक कमजोरी है तो हमारे घर के बड़े बुड्ढे हल्दी वाला ढूध पीने को देते है| हल्दी जहा एक और खाने का स्वाद बढ़ा देता है वही हल्दी शरीर की कई बीमारियों से बचने में मदद करता है |और हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में हमारी सहायता करता है |आज हम आपको बताएँगे की कैसे आपने ड्रिंक में हमने थोड़ा सा चेंज किया है जोकि आपको बहुत ही आश्चर्यजनक फायदे देगा |
हल्दी वाला पानी बनने की विधि : आपने एक गिलास गर्म पानी में आधा नीबू निचोड़ना है औए एक चोथाई चम्मच हल्दी मिला देनी है |और थोड़ा सा ठंडा करके शहद मिलकर पी जाना है |आपने एक बात धयान रखनी है यदि पानी में हल्दी नीचे बैठ जाये पर आपने इसे चम्मच से मिलाकर पीना है |अब हम आपको हल्दी वाला पानी के सेवन का तरीका बताते है इसको आपने हर रोज खाली पेट सुबह नाश्ते से पहले पीना है |
हल्दी वाला पानी पीने के फायदे
हल्दी वाला पानी पीने से हमारा दिमाग तेज होता है |क्योकि हल्दी हमारे दिमाग के लिए बहुत ही अच्छी होती है |इससे हमारी भूलने वाली बीमारी कम हो जाती है |जैसे की डिमेंशिया व अल्जाइमर तक सुबह खाली पेट हल्दी वाला पानी पीने से ठीक हो जाती है |
सुबह खाली पेट हल्दी वाला पानी पीने से शरीर की सूजन कम हो जाती है |क्योकि हल्दी में करक्यूमिन नामक तत्व पाया जाता है जोकि हमारे शरीर में एक एंटीबायोटिक का काम करता है |इसको पीने से शरीर की सूजन ही नहीं जोड़ो के दर्द में भी बहुत ही फायदा पहुंचता है |जोड़ो के दर्द में हल्दी का पानी दवाइयों से ज्यादा फायदा पहुंचता है
हल्दी वाला पानी हमारे लिवर की रक्षा करता है |क्योकि इससे हमारे शरीर के टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते है |जिससे लिवर सही ढंग से काम करता है |अगर कही हमारे लिवर के सेल्स ख़राब हो गए हो तो भी हल्दी वाला पानी पीने से बहुत ही ज्यादा फायदा मिलता है |
हल्दी वाला पानी से हमारा गोल ब्लैडर अर्थार्त पिताशय भी सही तरीके से काम करता है |
हल्दी वाले पानी का नियमित सेवन से हमारी बढ़ती उम्र का असर को कम करने में मदद करता है |और आपको जवान व खूबसूरत भी बनाता है |क्योकि हल्दी वाला पानी शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर निकलने में मदद करता है और इसको हर रोज पीने से फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद मिलती है |जोकि हमारी बढ़ती उम्र का असर बेअसर कर देता है और हमें जवान व सूंदर बनाता है |
हल्दी करक्यूमिन नामक तत्व पेय जाता है जोकि शरीर में एक ताक़तवर एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है नीबू भी शरीर में एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है |ये दोनों मिलकर कैंसर को पैदा करने वाली कोशिकाओं से लड़ने का काम करता है |
सुबह खाली पेट है हल्दी पानी पीने से हमारा पाचन तंत्र मजबूत होता है |और हमारा पाचन तंत्र सुचारू रूप से कार्य करता है |हल्दी वाला पानी पीने से हमारा खाना जल्दी हजम हो जाता है और पेट से सम्बंधित बीमारिया दूर हो जाती है |क्योकि इसको पीने से ऐसे पित्त का निर्माण होता है जोकि खाने को जल्दी हजम करने में बहुत ज्यादा मदद करता है |इसलिए हमें हल्दी वाले पानी का नियमित सेवन करना चाहिए |
हल्दी वाला पानी पीने से हमारा शरीर में रक्त संचार सही रूप से होता है |और हमारे खून को साफ़ करने में मदद करता है |
हल्दी वाला पानी पीने से डाइबिटीज कण्ट्रोल में रहता है क्योकि इससे शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को कम कर देता है और शुगर टाइप 2 को ठीक करने में बहुत ही मदद करता है |
हल्दी वाला पानी पीने से हमारे दिल की धमिनयों में जमा हुवा खून को भी हटाता है और खून को तो साफ़ करता ही है |और हमारा दिल सही ढंग से काम करता है |
शुक्रवार, 16 नवंबर 2018
हेपेटाइटिस से बचाव के लिए घरेलू उपचार
हेपेटाइटिस रोग, लीवर में सूजन और जलनके कारण होता है। लीवर शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण कार्य करता है। पोषक तत्वों को स्टोरेज करने के साथ ही शरीर में ऊर्जा के संचार को कंट्रोल करना और कोलेस्ट्रॉल आदि का निर्माण भी लीवर ही करता है। लीवर यानि गुर्दे में परेशानी तब आती है जब हानिकारक पेय या भोजन अधिक मात्रा में खाया जाता है। शराब या अन्य नशीले पदार्थ लीवर पर बुरा असर डालते हैं। इससे इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है। कई बार यह आनुवंशिक समस्या भी हो सकती है।
हेपेटाइटिस के लक्षणों में पेट के दायीं ओर के हिस्से में भारीपन लगता है, पीलिया हो सकता है, थकावट महसूस होती है तथा खुजली होती है। हेपेटाइटिस का उपचार घरेलू सामग्री से भी संभव है लेकिन स्थिति अगर काबू में न आए तो चिकित्सक के पास जाना ही ठीक होता है।
कुछ घरेलू उपाय
1. अजवायन और जीरा
एक चम्मच अजवायन और एक चम्मच जीरा पीसकर पाउडर बना लें। इसमें एक चुटकी नमक मिलाएं। इस चूरन को रोजाना दो बार खाएं। इससे इम्यूनिटी बढ़ेगी और हेपेटाइटिस में आराम होगा।
2. लिकोरिस पाउडर और शहद
एक बड़ा चम्मच लिकोरिस पाउडर में दो चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन खाएं। हेपेटाइटिस के उपचार में यह भी बेहद फायदेमंद है। इसके साथ ही लिकोरिस की जड़ को पानी में उबालकर उसकी चाय भी बनाई जा सकती है।
3. लहसुन
लहसुन रक्त को साफ करता है और शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है ऐसे में रोजाना सुबह खाली पेट लहसुन की एक से दो कली चबाएं। साथ ही खाना बनाने में भी लहसुन का प्रयोग मसाले के रूप में जरूर करें।
4. हल्दी
हल्दी इनफ्लेमेंटरी गुणों से भरपूर होती है। हल्दी का इस्तेमाल भी हेपेटाइटिस से रक्षा कर सकता है। हल्दी को दूध में डालकर पीने से भी बहुत लाभ होता है। हालांकि पीलिया होने में हल्दी लेने की मनाही होती है।
5. काली गाजर
काली गाजर के भी बहुत फायदे हैं। विटामिन से भरपूर काली गाजर से खून की कमी पूरी होती है तथा रक्त संचार सुधरता है। हेपेटाइटिस में भी गाजर को सलाद के रूप में खाने से बहुत फायदे होते हैं।
6. ग्रीन टी
ग्रीन टी यानि हर्बल चाय गुणों से भरपूर होती है। ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट (antioxidant) होते हैं जो शरीर के साथ ही मस्तिष्क को भी स्वस्थ रखते हैं। हेपेटाइटिस के उपचार और बचाव के लिए ग्रीन टी को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
7. आंवला
आंवला विटामिन सी से भरपूर होता है जो लीवर को हर तरह से फायदा पहुंचाता है। आंवला का प्रयोग च्यवनप्राश में भी किया जाता है जिससे इम्यूनिटी बढ़े और पाचन शक्ति मजबूत हो। ऐसे में आंवला का प्रयोग दैनिक आहार में भी किया जा सकता है। आंवला जूस, चटनी, अचार आदि को दैनिक आहार में शामिल करें।
8. अलसी के बीज
अलसी के बीज शरीर में हार्मोन का संतुलन दोनों बनाए रखते हैं और उन्हें रक्त में सही तरीके से भेजने का काम भी करते हैं। फ्लैक्स सीड में सायटोकांस्टीट्यूएंट्स होते हैं जो कि हार्मोन की बाइंडिंग का काम करते हैं और लीवर पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ने देते। फ्लैक्स सीड को यूं ही टोस्ट के ऊपर, सलाद मे या दाल आदि में डालकर खाया जा सकता है। यह लीवर को मजबूत बनाने में सहायक है जिससे हेपेटाइटिस रोग से बचाव होता है।
टूथ पेस्ट की हकीकत
क्या आपके टूथ पेस्ट में चारकोल हैं, और क्या आप अब तक मुर्ख बनते आये हो और आगे भी स्वदेशी या विदेशी के नाम पर बनते आओगे तो कोई नयी बात नहीं, क्यों के हम बेवकूफ थे हैं और रहेंगे।
पहले विदेशी लोग हमको अनपढ़ और गंवार कहते थे क्यों के हम भारतवासी नमक, नीम्बू, कोयले, नीम, बबूल, शीशम या किसी पेड़ की दातुन से अपने दांत साफ़ करते थे। तब हमने क्या किया, अपनी सब चीजे फेंक कर बन गए अंग्रेज, और आज वह हम से ये पूछते हैं के क्या हमारे टूथ पेस्ट में नमक, नीम, नीम्बू या कोयला हैं।
सही में लोग कितने बेवकूफ और मुर्ख बने ये आज अहसास हुआ जब टेलीविज़न पर ऐसी ऐड आती हैं, और हम बेवकूफो को अब भी ये समझ नहीं आती।
वैसे तो हर बार खाने के बाद दांत साफ़ करने चाहिए, कई लोग दांतों को बहुत जोर लगाकर ब्रश से साफ करते हैं, जोकि गलत है। ब्रश से आपके दांत साफ़ नहीं होते अपितु घिस जाते हैं। दांतों को हमेशा दातुन या मंजन से साफ करना चाहिेये। इसमें सामान्तया नीम, बबूल, या शीशम की दातुन या कोई आयुर्वेदिक मंजन इस्तेमाल करे, इस से आपके दांत स्वस्थ और मज़बूत रहेंगे। कई गाँवो में तो अब भी कुछ लोग चूल्हे की राख से मंजन करते हैं, और उनके दांत100 साल की उम्र में भी बिलकुल स्वस्थ हमने देखे हैं। इसका ताज़ा उदहारण विदेशी कंपनिया हैं जो अब अपना उत्पाद ये कह कर बेच रही हैं के उस में नमक, नीम, नीम्बू या चारकोल हैं, जबकि हमारे पूर्वज तो कब से इस रहस्य को जानते थे, मगर उन्होंने पहले हमको ये कह कर मुर्ख बनाया के हम लोग कोयले से नमक से, नीम से, या नीम्बू से दांत घिसते हैं, और आज झक मार कर उन्होंने इस को स्वीकार किया, मगर हमको किस पागल कुत्ते ने काटा हैं, जो हम इसको स्वीकार नहीं कर पा रहे। आज से 50 साल पहले तक ये डेंटिस्ट वगैरह नहीं थे, और थोड़ा बहुत जो ज़रूरी होता था वह गाँव का वैद ही कर दिया करता था, आज तो डेंटिस्ट ही डेंटिस्ट हैं, और देशी से विदेशी कम्पनियो के उत्पादों की भरमार हैं फिर भी ना तो हमारे दांत स्वस्थ हैं ना ही हमारे बच्चो के। तो क्या हम ऊपर से ये लिखवा के लाये हैं के हम हमेशा से बेवकूफ थे और बेवकूफ ही रहेंगे।
कोलगेट पेप्सोडेंट क्लोज अप आदि सेहत के लिए ऐसी घातक है के ये धीरे धीरे आपको मौत के मुह में ले कर जाती हैं, जब ये चीजे आपके मुह में जाती हैं तो ये कहना कोई गलत नहीं होगा के चाहे थोड़ी मात्रा में ही सही ये आपके शरीर में प्रविष्ट करती हैं, तो क्या आप खतरों के खिलाडी हो, और ये खतरे अपने बच्चो पर भी आज़माना चाहते हो। और ये कंपनिया खुद भी मानती हैं के अगर कोई आदमी या बच्चा ये निगल ले तो तुरंत डॉक्टर को दिखाए क्यों के इस से कैंसर तक हो सकता हैं, जहाँ से ये कंपनिया आती हैं, इनके देश के अपने कानून इतने कड़े हैं वह इनको ये लिखना पड़ता हैं के इसकी बहुत थोड़ी मात्रा इस्तेमाल करे, और गलती से निगल से तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करे और 5 साल से छोटे बच्चो को इस से दूर रखे और अगर वो करे तो किसी निरीक्षक की देख रेख में। और हम यहाँ खुद अपने बच्चो को ब्रश पर बड़ी सी पेस्ट लगा कर देते हैं और खुश होते हैं के हमारे बच्चे ने ब्रश करना सीख लिया, वरन उसको बीमारियो के मुह में खुद ही भेज रहे हैं। इसलिए सावधान। आज ही इनको अपने घर से बाहर निकालिये, और काले अंग्रेजो से भी बचे, जो भारतीय कंपनिया भी आपको पेस्ट दे रही हैं, वो भी आपकी मित्र नहीं, आप बचना चाहते है तो सिर्फ मंजन या दातुन ही कीजिये।
जब आप अगली बार बाजार से ये कोई भी टूथ पेस्ट चाहे वो स्वदेशी हो चाहे वो विदेशी हो ले कर आये तो ये सोच कर लाना के आप घर में अपने और अपने बच्चो के लिए कैंसर ले कर आ रहे हैं।
रविवार, 11 नवंबर 2018
बेशकीमती जड़ी-बूटी
कीड़ा जड़ी
क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर के हर रोग का इलाज सिर्फ एक जड़ी-बूटी है। इस जड़ी का नाम है कीड़ाजड़ी। जी हां ये एक ऐसी जड़ी है, जिसकी बदौलत आपके शरीर में मौजूद हर बीमारी खत्म हो जाती है। यह खासतौर पर उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ये पाई जाती है। इसके सेवन से इंसान के शरीर में कई प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। इस जड़ी को सिर्फ बर्फीले इलाकों में पाया जाता है। इसकी कीमत करीब 2 लाख रुपये किलो होती है। इसका वैज्ञानिक नाम कॉर्डिसेप्स साइनेसिस या फिर कॉर्डिसेप्स मिलिटरीज भी है। आयुर्वेद में कीड़ाजड़ी को जड़ी-बूटी की श्रेणी में रखा गया है। जिसे हिमालयी वियाग्रा के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल यह जड़ी बूटी यह एक मृत कीड़े का रुप होता है।
इसमें प्रोटीन, अमीनो एसिड, पेपटाइड्स, विटामिन बी-1, बी-2 और बी-12 जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये तत्काल रूप में ताक़त देते हैं। कहा जाता है कि कीड़ाजड़ी से बेहतर शक्तिवर्धक दवा कोई नहीं है। हिमालयी क्षेत्रों में तिब्बत और नेपाल में भी इसका कारोबार होता है। हालांकि इसके वास्तविक गुणों के बारे में कुछ एक लोग ही जानते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में इसे कीड़ा-जड़ी कहा जाता है। उधर तिब्बत और चीन में इसे यार्सागुम्बा या यारसागम्बू कहा जाता है।सामान्य तौर पर समझें तो ये एक तरह का जंगली मशरूम है, जो एक खास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उस पर पनपता है। मई से जुलाई में जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू हो जाता है। कीड़ाजड़ी भूरे रंग की होती है, और इसकी लंबाई लगभग 2 इंच होती हैहिमालय में बर्फ पिघलने पर, नेपाल के सैकड़ों ग्रामीण दुर्लभ जड़ी बूटी, यार्सागुम्बा को इकट्ठा करने के लिए चोटी की ओर भागते हैं। बहुत सावधानी के साथ वे लोग इसे साफ़ करते हैं और अपने पास रख लेते हैं।
अनुभवी लोग इसे एकत्रित करके एक सीजन में लाखों कमा लेते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस जड़ी बूटी को दुनिया की सबसे महंगी जड़ी बूटी माना जाता है और ये लगभग 6 लाख प्रति किलो के हिसाब से बिकता है
प्राकृतिक इलाज के तौर पर इसका सबसे बेहतर इस्तेमाल किया जाता है। खास बात ये है कि इस जड़ी का कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। आमतौर पर गंभीर रोगों के इलाज के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल सांस और गुर्दे की बीमारी में भी किया जाता है। साथ ही इसके बारे में कहा जाता है कि ये उम्र के असर यानी बुढ़ापे को भी बढ़ने से रोकता है। ये शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। कीड़ा जड़ी के औषधीय गुण
- कीड़ा जड़ी या यार्सगुम्बा को फेफड़ों और गुर्दे को मजबूत करने, ऊर्जा और जीवन शक्ति को बढ़ाने, रक्तचाप को रोकने, कर्कश को कम करने के लिए भी शक्तिशाली माना जाता है।
- कीड़ा जड़ी या यार्सगुम्बा पारंपरिक रूप से नपुंसकता, पीठ दर्द, शुक्राणु उत्पादन में वृद्धि और रक्त उत्पादन में वृद्धि के लिए उपयोग किया जाता है।
- यार्सगुम्बा या यारचगुम्बा का उपयोग अस्थि मज्जा बनाने के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त थकावट, पुरानी खांसी और अस्थमा, नपुंसकता, दुर्बलता, एनीमिया के लिए किया जाता है।
- कीड़ा जड़ी को सांस, अस्थमा, नपुंसकता, उत्सर्जन, कमर और घुटनों, चक्कर आना और टिनिटस की सूजन की कमी के लिए लिया जाता है।
- कीड़ा जड़ी का उपयोग ट्यूमर रोगियों की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए भी किया जाता है, जिन्हें रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी या ऑपरेशन कॉर्डिसप्स या यार्सगुम्बा या यारचगुम्बा प्राप्त किया जाता है, प्राकृतिक वियाग्रा भी उपयोग किया जा सकता है।
- शरीर को प्रतिरोध करने और वायरस और बैक्टीरिया से होने वाले हमलों का सामना करने में मदद करने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करें।
- ट्यूमर की गतिविधि रोकता है।
- रात में नींद की समस्याएं नियंत्रित करती हैं और इस प्रकार नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है, इससे न्युटुरिया की गंभीरता भी कम हो जाती है।
- रक्त परिसंचरण में सुधार करता है और रक्तचाप को नियंत्रित करता है।
- ट्राइग्लिसराइड्स और कोलेस्ट्रॉल स्तर को कम करें, इस प्रकार कार्डियोवैस्कुलर हीथ को बढ़ावा देना।
- पुरुषों में यौन उत्थान में सुधार और महिलाओं में बांझपन का मुकाबला भी करें।
- एराइथेमिया को कम करता है, इस प्रकार दिल की रक्षा करता है।
- एलर्जी का प्रतिरोध करता है।
- जीवन शक्ति और सहनशक्ति बढ़ाता है। यह थकान को कम करने, शारीरिक धीरज और मानसिक तीक्ष्ता बढ़ाने में विशेष रूप से उपयोगी है।
- यकृत, फेफड़े और गुर्दे की समस्या को नियंत्रित करता है, एमडी इस प्रकार उनकी रक्षा करता है। यह श्वसन समस्याओं का भी प्रतिरोध करता है।
- कमर और घुटनों के दर्द को कम करता है।
- रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी के कारण दुष्प्रभावों को निष्क्रिय करता है।
- मुक्त कट्टरपंथी क्षति और ऑक्सीडेटिव तनाव के खिलाफ सुरक्षा करता है, इस प्रकार उम्र बढ़ने के प्रभाव को धीमा कर देता है।
कीड़ा जड़ी खाने का तरीका
कीड़ा जड़ी को खाने का तरीका बहुत आसान है।
एक स्वस्थ व्यक्ति एक बार में 0.3 से 0.7 ग्राम के बीच कीड़ा जड़ी का सेवन रोजाना कर सकता है।
कीड़ा जड़ी को आप गर्म पानी में घोलकर,कीड़ा जड़ी के चूर्ण को दूध में मिलाकर या अन्य किसी प्रकार के पेय में मिलाकर ले सकते है
कीड़ा जड़ी की पहचान
कीड़ा जड़ी मुख्य रूप से एक कीड़े के रूप में एक जड़ी बूटी होती है। यह उगते समय हरे रंग की होती है। कीड़ा जड़ी खुरदरा होता है और यह कई जगहों से नुकीला होता है। खाने के लिए इसे या तो छीला जाता है या फिर कीड़ा जड़ी को चूर्ण या पाउडर में पीसा जाता है।
शनिवार, 10 नवंबर 2018
दमा रोग
कई बार आप लोगों ने देखा होगा कोई बीमारी ना होते हुए भी सांस फूलने लगती है ये कोई जरुरी नहीं है की सांस केवल मोटे व्यक्ति की ही फूले ऐसा किसी भी व्यक्ति के साथ हो सकता है फिर चाहे वो पतला इंसान ही क्यों न हो . इसके पीछे का जो कारण है वो आज आपको बताते हैं अक्सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है।
सांस की बीमारी होने के कारण :
सांस फूलना या सांस ठीक से न लेने का अहसास होना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क से मिलने वाला संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देता है। फेफड़ों से संबंधित पूरी प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों की वजह से भी सांसों की समस्या आती है। फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य टाक्सिंस की वजह से श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट के कारण भी सांस लेने में दिक्कत आती है। दिल की बीमारियों और खून में ऑक्सीजन का स्तर कम होने से भी सांस फूलती है।इस वजह से 2 बीमारियां आमतौर पैर हो जाती है 1.दमा 2. ब्रोंकाइटिस.
1. दमा(अस्थमा )
जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं।
▶ लक्षण :
दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी पेशियों में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़े श्वास की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाते हैं। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है। इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है जब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो सांस को अन्दर लेने मैं कठिनाई होती है तथा सांस को बाहर लम्बे समय के लिए छोड़ना होता है। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है।
जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है। दमा रोग प्राकृतिक चिकित्सा से पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
▶ दमा होने का कारण :
कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।
खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग सकता है।
मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
खून में किसी प्रकार से दोष उत्प जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है।
नशीले पदार्थों का अधिक सेवन कारण दमा रोग हो सकता है।
खांसी, जुकाम तथा नजला रोग समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है।
नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिय करने से दमा रोग हो सकता है।
भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है।
मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है।
फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी तथा स्नायुमण्डल में कमजोरी हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है।
मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है।
धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।
मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में ज उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है।
मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दम रोग हो सकता है।
धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रह या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।
▶ दमा का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :
दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को नार पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी क भिगोकर खायें तथा इसके पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिएं तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिल पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।
1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
दमा रोग प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी हैं जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभांति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तानमन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोज नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
इस रोग से पीड़ित घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्रल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
▶ दमा रोगी के लिए सावधानियां :
दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को प्रदूषित वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है।
रोगी व्यक्ति को मानसिक तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ों से बचना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोग तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।
2. ब्रोंकाइटिस
जीर्ण जुकाम को ब्रोंकाइटिस भी कहते हैं। इस रोग के कारण रोगी की श्वास नली में जलन होने लगती है तथा कभी-कभी तेज बुखार भी हो जाता है जो104 डिग्री तक हो जाता है। यह रोग संक्रमण के कारण होता है जो फेफड़ों में जाने वाली सांस की नली में होता है। यह पुराना ब्रोंकाइटिस और तेज ब्रोंकाइटिस 2 प्रकार का होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को सूखी खांसी, स्वरभंग, श्वास कष्ट, छाती के बगल में दर्द, गाढ़ा-गाढ़ा कफ निकलना और गले में घर्र-घर्र करने की आवाज आती है।
▶ तेज ब्रोंकाइटिस
इस रोग के कारण रोगी को सर्दियों में अधिक खांसी और गर्मियों में कम खांसी होती रहती है लेकिन जब यह पुरानी हो जाती है तो खांसी गर्मी हो या सर्दी दोनों ही मौसमों में एक सी बनी रहती है।
▶ तेज ब्रोंकाइटिस के लक्षण
तेज ब्रोंकाइटिस रोग में रोगी की सांस फूल जाती है और उसे खांसी बराबर बनी रहती है तथा बुखार जैसे लक्षण भी बन जाते हैं। रोगी व्यक्ति को बैचेनी सी होने लगती है तथा भूख कम लगने लगती है।
▶ तेज ब्रोंकाइटिस के कारण
जब फेफड़ों में से होकर जाने वाली सांस नली के अन्दर से वायरस (संक्रमण) फैलता है तो वहां की सतह फूल जाती है, सांस की नली जिसके कारण पतली हो जाती है। फिर गले में श्लेष्मा जमा होकर खांसी बढ़ने लगती है और यह रोग हो जाता है।
▶ पुराना ब्रोंकाइटिस
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग रोगी को बार-बार उभरता रहता है तथा यह रोग रोगी के फेफड़ों को धीरे-धीरे गला देता है और तेज ब्रोंकाइटिस में रोगी को तेज दर्द उठ सकता है। इसमें सांस की नली में संक्रमण के कारण मोटी सी दीवार बन जाती हैं जो हवा को रोक देती है। इससे फ्लू होने का भी खतरा होता है।
▶ पुराना ब्रोंकाइटिस का लक्षण
इस रोग के लक्षणों में सुबह उठने पर तेज खांसी के साथ बलगम का आना शुरू हो जाता है। शुरू में तो यह सामान्य ही लगता है। पर जब रोगी की सांस उखडने लगती है तो यह गंभीर हो जाती है जिसमें एम्फाइसीमम का भी खतरा हो सकता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण रोगी के चेहरे का रंग नीला हो जाता है।
▶ पुराना ब्रोंकाइटिस होने का कारण
रोग होने का सबसे प्रमुख कारण धूम्रपान को माना जाता है। धूम्रपान के कारण वह खुद तो रोगी होता ही है साथ जो आस-पास में व्यक्ति होते हैं उनको भी यह रोग होने का खतरा होता है।
तेज तथा पुराना ब्रोंकाइटिस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार
ब्रोंकाइटिस रोग हो जाता है तो उसे 1-2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा फिर फलों का रस पीना चाहिए तथा इसके साथ में दिन में 2 बार एनिमा तथा छाती पर गर्म गीली पट्टी लगानी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
पुराना ब्रोंकाइटिस रोग बहुत जल्दी ठीक नहीं होता है लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए नमकीन तथा खारीय आहार का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए तथा शारीरिक शक्ति के अनुसार उचित व्यायाम करना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
क्षारधर्मी प्रकार केआहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) है जिनका सेवन करने से ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है। क्षारधर्मी आहार (नमकीन, खारा, तीखा तथा चरपरा) इस प्रकार हैं-आलू, साग-सब्जी, सूखे मेवे, चोकर समेत आटे की रोटी, खट्ठा मट्ठा और सलाद आदि।
अधिक मात्रा में पीना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को खुली हवा में टहलना चाहिए और सप्ताह में कम से कम 2 बार पानी में नमक मिलाकर उस पानी से स्नान करना लेना चाहिए। इसके फलस्वरूप पुराना ब्रोंकाइटिस रोग ठीक हो जाता है।
रीढ़ की हड्डी पर मालिश करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर सिंकाई करनी चाहिए इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक आराम मिलता है और उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
रोगी को प्रतिदिन अपनी छाती पर गर्म पट्टी लगाने से बहुत आराम मिलता है। समय में प्राणायाम क्रिया करनी चाहिए। इससे श्वसन-तंत्र के ऊपरी भाग को बल मिलता है और ये साफ रहते हैं। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
शुक्रवार, 9 नवंबर 2018
पत्थरचट्टा का पौधा
पत्थरचट्टा का पौधा एक लंबा, सीधा और बारहमासी पौधा होता है जो लगभग 1-2 मीटर तक लंबा होता है। यह एक जड़ी बूटी है इसके पत्ते विभिन्न औषधीय उपयोग के लिए जाने जाते हैं। इस पौधे के तने खोखले होते हैं जिनका रंग हरा या लाल होता है। इस पौधे की छाल मोटी, चमकदार और रसीली होती है। इसकी पत्तियां 5-25 सेमी. लंबी और 2-12 सेमी. चौड़ी होती है। इस पौधे की शाखाओं में 6-7 पत्ते होते हैं। इसकी एक विशेषता यह है कि इसके पत्ते गीली जमीन पर अलग से नये पौधे को जन्म दे सकती हैं। इसके फूलों का रंग हरा-पीला या गुलाबी हो सकता है। ये फूल सर्दी और बसंत के मौसम में फूलते हैं।
पथरचटा में जीवाणुरोधी, एंटीवायरल, एंटीमिक्राबियल, एंटीफंगल, एंटीहिस्टामाइन और एनाफिलेक्टिक गुण होते हैं जो कि लगभग सभी प्रकार की बीमारियों को कम करने में मदद करते हैं।
पत्थरचट्टा के फायदे
गुर्दे की पथरी के लिए पत्थरचट्टा के फायदे
जिन लोगों को गुर्दे की पथरी की समस्या होती है, उनके लिए पत्थरचट्टा के फायदे इसलिए हैं क्योंकि यह आसानी से पित्त पत्थर को ठीक कर सकता है। गुर्दे के पत्थरों के मामले में पत्थरचट्टा के पूरे पौधे को उबालकर 40-50 मिली लीटर काढ़ा तैयार करें जिसे दिन में दो बार सेवन करें। आप 5 ग्राम शिलाजीत के साथ 2 ग्राम पथरचटा के काढ़ें को भी दे सकते हैं आप इसे स्वादिष्ट बनाने के लिए शहद भी मिला सकते हैं। इस मिश्रण को भी दिन में दो बार तक सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से आप पथरी की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।
सिर दर्द के लिए –
एयर प्लांट या पत्थरचट्टा के फायदे उन लोगों के लिए भी होते हैं जो अक्सर सिरदर्द की समस्याओं से ग्रसित रहते हैं। पथरचटा की पत्तियों से आप अपने सिरदर्द का उपचार कर सकते हैं। इस पौधे की पत्तियों को तोड़ें और उन्हें माथे पर चिपकाएं। यह आपके लिए किसी दवा से कम नहीं है। ऐसा करने से आपको सिरदर्द से छुटकारा पाने में मदद मिलती है।
फोड़ों के इलाज में फायदे –
इस आयुर्वेदिक औषधी पथरचटा के फायदे फोड़ों का उपचार करने के लिए चमत्कारिक है। पत्थरचट्टा के पत्तों को तोड़कर इन्हें हल्का गर्म करने के बाद फोड़े और सूजन वाली जगह पर रखकर बांधलें। यह आपकी सूजन को कम करने के साथ ही फोड़ों का उपचार करने में मदद करता है।
घावों को ठीक करे –
यदि आपके शरीर के किसी भी अंग में कोई घाव है तो आप पत्थरचट्टा का उपयोग करके इन घावों का उपचार कर सकते हैं। आप इसकी पत्तियों को तोड़कर इन्हें पीस लें और हल्की आंच में गर्म करें। फिर इस मिश्रण को फोड़ों के ऊपर लगाएं। यह जड़ी बूटी घावों को ठीक करने के साथ साथ उनके निशानों को भी दूर करने में आपकी मदद करेगी।
पथरी भयंकर रोग
पथरी को अश्मरी , आैर स्टोन या कैलकुलस भी कहते है । यह अधिकतर पित्ताशय मण्डल यथा पित्ताशय एवं मूत्राशय मण्डंल ,गुर्दे की पथरी तथा मूत्राशय में पाई जाती है । यदि समय रहते इसका उपचार नहीं किया जाएं तो यह यम के समान यातना पहुंचाती है । आयुर्वेद महर्षियों ने पथरी रोग को आठ महारोगो में माना है । क्योंकि पथरी यदी लंबे समय तक पडी. रहे तो न केवल उस अंग को क्षतिग्रस्त करती है, अपितु शरीर पर भी अनेक दुष्प्रभाव डालती है। यहां तक कि गुर्दे में रूकावट,शोथ, गुर्दे एंव शरीर पर सुजन गुर्दे का फेल हो जाना गुर्दे का कैंसर होना,पित्त की थैली में सुजन,पीलिया हो जाना, पित्ताशय का कैंसर आदि होने की संभावना रहती है । इसलिए कहा गया है कि पथरी का सर्वप्रथम इलाज आैषधि से करें परन्तु यदि आैषधियों से काम न चले ताे शल्य चिकित्सा द्धारा आपरेशन कर निकाल दें। नहीं ताे यह जानलेवा हो सकती है ।
पथरी कैसे बनती है :- पित्त एवं मूत्र में तरलता की कमी एवं न घुलने वाले पदार्थो की अधिकता होने से श्लेष्मा से मिलकर पथरी बनती है ।
गुर्दे की पथरी के लक्षण :- पथरी के आकार तथा स्थिती के अनुसार ये लक्षण होते है । आमतौर पर रोगी को इस रोग के कारण दर्द ,बार बार मुत्र आना तथा संक्रमण, मुत्र में अवरोध ,रोगी को अचानक कमर में तेज दर्द होता है । जो पीछे की आेर तथा जांघो की तरफ,वृष्णों की तरफ,लिंग के किनारे तक जाता है । दर्द धीरे धीरे बढता है आैर कुछ ही मिनटो में अति तीव्र हो जाता है । रोगी बेचैन हो जाता है आैर शारीरिक स्थितियां बदल-बदल कर चैन पाने की कोशिश करता है ।
उपाय:-
- सामर्थ्य के अनुसार व्यायाम एवं परिश्रम करे ।
- हल्का एवं सुपाच्य भोजन करे ताजे,रेशे एवं रसदार फल एवं सब्जियों का अधिक से अधिक सेवन करें ।
- देखा गया है कि कब्ज के रोगियों को पित्ताशय की पथरी अधिक मिलती है । अत: पेट में कब्ज न होनें दे ।
- ज्यादा चर्बी वाले पदार्थ जैसे घी ,मक्खन,मलाईयुक्त दूध, सूखे मेवे आलूचीनी, मैदे से बनी एवं घी मे तली चीजो का सेवन न करे या कम से कम करें ।
परहेजः-
- कुल्थी कि दाल का पानी पने से पथरी का नाश होता है । कुल्थी में पथरी का भेदन तथा मूत्रल दोनों गुण होने से यह पथरी बनने की प्रवृत्ति आैर पुनरावृति को रोकती है ।
-कैल्शियम और लौह से संम्बधिंत खाघ पदार्थो और सख्त बीज वाली सब्जिीयों व फल से परहेज रखें ।
- कलमीशोरा,नौशादर ,वरण, पाषाण भेद,गिलोय,ऑवला,पुनरनवा,एवं नरकचुर आदि से बनी दवा मूत्र खोलकर लाती है एवं पथरी को तोडकर दूर करती है ।
नोटः- कलमीशोरा का प्रयोग चिकित्सक के निर्देशानुसार करे,अन्यथा यह हानिकारक हो सकता है ।
गुरुवार, 8 नवंबर 2018
झंगोरा उत्तराखंडियों की ताकत का राज
झंगोरा
पहाड़ी क्षेत्रों में काफी मात्रा में उगाए जाने वाले झंगोरा के बारे में तो आप जानते ही होंगे। आज भले ही नई पीढ़ी के लोग झंगोरा को भूल रहे हैं, लेकिन आज झंगोरा की डिमांड देश के बाकी हिस्सों और विदेशों में भी बढ़ती जा रही है। लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि उत्तराखंड की नई पीढ़ी जानना तक नहीं चाहती कि आखिर झंगोरा किस बला का नाम है। धंगोरा का बिलियन डॉलर ग्रास के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखंड के अलावा अमेरिका, चीन, पाकिस्तान में भी इसकी खेती की जाती है। कहा जाता है कि झंगोरा सबसे तेजी से उगने वाली फसल होती है, ये किसी भी मौसम में या यूं कहें कि विपरीत वातावरण में भी उग जाता है।
कैसे झंगोरा आपके लिए ताकतवर साबित हो सकता है।
शुगर के रोगियों के लिए सबसे शानदार और पोषक तत्व झंगोरा से बढ़कर कोई नहीं है। ये शरीर में ग्लूकोज लेवल को मेंटेन रखता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, वसा, फाइबर, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, मैग्नीसियम, जिंक जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। कहते है कि 1970 के दशक में भारत में सबसे ज्यादा झंगोरा उगाया जाता था। साल 2000 तक इसका उत्पादन बढ़ता गया। इसके बाद इसके उत्पादन में भारी कमी आई है। बताया जाता है कि 2005 आते आते इसके उत्पादन में भारी कमी आ गई। शानदार फसल और पोषक तत्व कहा जाने वाला झंगोरा अब केवल पशुओं के चारे और शराब बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। उत्तराखंड में लोगों ने इस फसल का उत्पादन छोड़ा तो फ्रांस में इसका उत्पादन जबरदस्त तरीके से बढ़ गया है। बताया जा रहा है कि इस वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा झंगोरा का उत्पादन फ्रांस में होता है। इस वजह से फ्रांस की अर्थव्यवस्था कृषि पर काफी निर्भर है। धीरे धीरे बाकी मुल्कों में झंगोरा से कई तरह के खाद्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें पापड़, इडली, मिठाई, उपमा और ना जाने कैसे कैसे सेहतमंद और स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किे जा रहे हैं।
आज हम उत्तराखंडी झंगोरे की कीमत को भूल गए हैं। जो कभी उत्तराखंडियों की ताकत का राज कहा जाता था, हमारे पूर्वज पहाड़ों में पहले इसी की खेती करते थे। झंगोरा, कोदा, कौंड़ीं और कंडाली ये चार चीजें शरीर को बलवान तो बनाती ही हैं, इसके साथ ही शरीर को स्वस्थ और मजबूत रखने में काफी मददगार भी साबित होती हैं। आलम ये है कि विदेशों तक झंगोरा के गुणों के बारे में लोगों को पता चल गया है। लेकिन आज वो ही झंगोरा उत्तराखंड में बेफिक्री की मार झेल रहा है।
मंगलवार, 6 नवंबर 2018
अपनी सेहत को दुरुस्त कैसे रखें
यदि आप हेल्दी रहना चाहते हैं तो आपको पानी दिनचर्या में कुछ बदलाव करना होगा | इसके लिए आपको कुछ खास नही करना है, बस कुछ छोटी-छोटी लेकिन काफी महत्वपूर्ण बातों को अपनाना है | तो आइये जानते है इनके बारे में विस्तार से –
1. वे चीजें, जिनमें कैलरी ज्यादा हो, उन्हें थोड़ा ब्रेकफ़ास्ट में और थोड़ा लंच में लें | दिन भर अगर आप गतिशील रहती हैं तो उनसे आपका मैटाबालिज्म मजबूत होगा व आपको ज्यादा ऊर्जा मिलेगी | एक्स्ट्रा कैलरीज जल्दी बर्न भी होंगी | डिनर में वसायुक्त भोजन न लें |
2. अगर आप हाउसवाइफ हैं, घर में रोजमर्रा के काम करते हुए इस बात का ध्यान रखें कि आपका काम करने का तरीका ऐसा हो, जिससे कैलरीज ज्यादा से ज्यादा बर्न कर पाएं | जल्दी-जल्दी उठने-बैठने की आदत डालें व आलस से दूर रहें |
3. लिफ्ट या एलीवेटर के स्थान पर सीढ़ियों का उपयोग करें |
4. रोज एक बोल ओटमील खाना भी कोलेस्ट्राल कम करने के लिए फायदेमंद रहता है |
5. यदि ज्यादा खाने की आदत है तो धीरे-धीरे चबा कर खाना खाएं | एक बाइट को कम से कम 20 मिनट लगा कर चबाएं | अधिक समय लगने से पेट भरा लगेगा और पाचन-क्रिया ठीक होगी |
6. थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ खाने से भी आप एक बार भर पेट खाना खाने से बच पाएंगी और कम कैलरी लेंगी |
7. सूप पसंद है तो उसे बना कर फ्रिज में रखें | दोबारा गरम करने से पहले उसके ऊपर की टॉपिंग उतार दें, जिससे अतिरिक्त फैट उस पर से हट जाए |
8. कैफीन व एल्कोहल से बनी चीजों से दूर रहें |
9. शरीर में आयरन की कमी पता चले तो रोज पालक का जूस पिएं | प्राकृतिक आयरन हासिल करने का इससे बेहतर स्त्रोत और कोई नहीं |
10. पानी ज्यादा से ज्यादा पीने की आदत बनाएं, इससे लिवर ठीक से काम करेगा, पाचन-क्रिया दुरुस्त रहेगी, जिससे शरीर को फायदा होगा | इसका परिणाम आपके चेहरे पर भी नजर आएगा |
11. एक्सरसाइज को अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाएं | उसकी शुरुआत वार्म अप एक्सरसाइज से करें व अंत कूल डाउन से | शरीर को धीरे-धीरे एक्सरसाइज के लिए तैयार करना जरूरी होता है |
12. एक्सरसाइज के समय ढीले व नेचुरल फैब्रिक से बने हल्के कपड़े पहनें | ऐसे, जो पसीने को सोख सकें व पहनने में आरामदायक हों |
13. यदि आप एक्सरसाइज करते हुए संगीत सुनती हैं तो आप अधिक समय तक एक्सरसाइज करने के साथ उसे एंजॉय भी कर सकती हैं | कुछ भी ऐसा चुनें, जो अलग हटकर हो और आप को पसंद आए | एकाग्रचित्त होने के लिए इससे बेहतर विकल्प कोई नहीं |
14. यदि एक्सरसाइज करते समय आपको दर्द, चक्कर, बेचैनी, सांस का सामान्य न रहना तो हो तुरंत डॉक्टर से राय लें | ध्यान रहे, किसी भी नई एक्सरसाइज की शुरुआत बिना किसी योग्य प्रशिक्षक की देख-रेख के न करें |
15. दिन व्यस्तता से भरा हो तो ब्रिस्क वाक के लिए 20 मिनट निकालें | इससे आपका तनाव कम होगा और मन तरोताजा हो जाएगा |
16. वाकिंग करते वक्त यदि आपके पेट में क्रैम्स पड़ रहें हों तो बीच-बीच में रुकें, कमर पर से आगे की तरफ झुकें, सांस अंदर-बाहर करें, धीरे-धीरे और गहरी सांसें लेकर | इससे आपके पेट के निचले हिस्से के मसल्स को सामान्य होने में मदद मिलेगी |
17. व्यस्त रोड या धुंए से भरे कमरे में एक्सरसाइज करने से बचें | हमेशा प्रदूषण रहित साफ व खुला वातावरण एक्सरसाइज के लिए चुनें |
18. सोच पाजिटिव रखें व सदा मुस्कराती रहें |
19. सोने व उठने का समय नियत करें व प्रतिदिन एक ही समय पर सोने जाएं |
20. सोने से कुछ देर पहले लाइट बंद कर दें, जिससे नींद अच्छी आए | कोई अच्छी पुस्तक पढ़ें या मधुर संगीत सुनें, वह नींद मीठी लाने में मदद करेगा |
कब्ज और गैस की समस्या के लिए योग |
कुछ लोगों के लिए कब्ज एक दैनिक मामला बन गया है।और, हम आम तौर पर इसे एक बीमारी मान लेते है ; जबकि यह एक लक्षण है। यदि सही समय पर इसका इलाज़ नहीं किया गया तो यह श्रोणि रोगों और पेट के विकारों में बदल सकता है । लेकिन हम अक्सर कब्ज को लापरवाही से लेते हैं।
कब्ज कैसे होता है?
कब्ज अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग मायने रखता है। कुछ लोगों के लिए यह असामयिक मल हो सकता है, और कुछ लोगों के लिए केवल कठिन मल का पारित होना हो सकता है । जो भी मामला हो, इस समस्या का मूल कारण हमारी अस्वास्थ्यकर जीवनशैली है।
अनुचित काम का समय, आराम करने के लिए कम समय और बहुत अधिक जंक फूड का सेवन हमारे शरीर को नुकसान पहुचाता है जिसे कि हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते है । इसके अलावा आहार में ताज़े फल और हरी पत्तेदार सब्जियों की कमी से, विशेष रूप से भोजन जिसमें फाइबर कम हो, कब्ज का कारण बन सकता है। पानी का कम सेवन भी एक और कारण है।
कब्ज के लक्षण |
⦁ अनियमित या कम मात्रा में मल त्याग
⦁ मल त्यागने में दबाव
⦁ छोटे या कठिन मल का पारित होना
⦁ पेट में दर्द और ऐंठन
⦁ फूला हुआ पेट
कब्ज का इलाज |
⦁ हमारे आहार के माध्यम से हम कब्ज का सरल तरीके से इलाज कर सकते हैं । ताजी पत्तेदार सब्जियों और फलों जैसे फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक से अधिक सेवन करें ।
⦁ पानी का खूब सेवन करें। सुबह में गर्म तरल पदार्थ का सेवन बहुत उपयोगी हो सकता है।
⦁ दैनिक मल त्याग के लिए एक नियमित दिनचर्या स्थापित करें ।
⦁ नियमित योगाभ्यास करें ।
योग, कब्ज को दूर करने का एक प्राकृतिक तरीका |
कुछ ही मिनटों का नियमित योग अभ्यास अनियमित मल त्यागने की तकलीफ़ को सुधारने में मदद करता है, पेट में खिंचाव और पेट फूलने की समस्या से भी राहत दिलाता है व सारा दिन सुख एवं शांति रखने में भी मदद करता है । योग हमारे शरीर को तरोताज़ा करता है और शरीर में रक्त औरऑक्सीजन के प्रवाह को भी बढ़ाने में मदद करता है। अधिकांश योग आसनों में श्रोणि का अच्छा संचलन शामिल होने के कारण, योग अभ्यास वास्तव में कब्ज से राहत दिलाने में मदद कर सकता हैं।
कब्ज दूर करने के लिए पाँच योगासन |
यहाँ कुछ योग आसन दिए गए हैं, नियमित रूप इनका अभ्यास करने पर, कब्ज की बीमारी में राहत मिल सकती है।
मयूरासन |
अर्ध मत्स्येंद्रासन |
हलासन |
पवनमुक्तासन |
तितली मुद्रा |
1. मयूरासन |
यह आसन पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है और अस्वास्थ्यकर भोजन के प्रभाव को नष्ट करता है। यह आसन पेट दबाव को बढ़ाता है ,जो प्लीहा और यकृत एनलार्ज्मेंट्स को कम कर देता है । यह आसन आंतो को भी मजबूत बनाता है। इस तरह से कब्ज की समस्या से राहत दिलाता में मदद करता है ।
2. अर्ध मत्स्येंद्रासन |
इस आसन के महत्वपूर्ण शारीरिक पहलू यह हैं की - यह अग्न्याशय, जिगर, तिल्ली, गुर्दे, पेट, और आरोही और अवरोही बृहदान्त्र को उत्तेजित करता है , इसलिए मल त्यागने में सुधार और कब्ज से राहत प्रदान करता है
3. हलासन |
यह आसन यकृत और आंत को आराम प्रदान करता है। यह एक ऐसा आसन है जो श्रोणि क्षेत्र में रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है और पाचन को भी बढ़ाता है।
4. पवनमुक्तासन |
जैसा नाम से ही पता चलता है, यह आसन शरीर से गैस को बाहर निकालने में मदद करता है। हम में से ज्यादातर नियमित कब्ज से पीड़ित लोगों के लिए यह एक आम परेशानी है। यह आसन अपच/ मन्दाग्नि सहित कई पाचन संबंधी विकार को भी दूर करने में मदद कर सकता है । यह अम्लपित्त से राहत दिलाने में भी मदद करता है, जो की अपच के कारण ही होता है ।
5.तितली मुद्रा |
यह आगे झुककर करने वाले आसन से हमारे पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद मिलती है और गैस, ऐंठन और पेट की सूजन से भी राहत दिलाता है। यह आसन तनाव को कम करने में भी मदद करता है जो कि अच्छे पाचन के लिए अत्यंत आवश्यक है ।
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